लोक संस्कृति के संरक्षण और वैश्विक प्रसार पर हुआ मंथन

श्रीनगर गढ़वाल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, बिड़ला परिसर द्वारा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोक संस्कृति और पॉप कल्चर’ के दूसरे दिन लोक संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन, नवाचार और वैश्विक प्रसार से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर गंभीर विमर्श हुआ। दूसरे दिन के तृतीय अकादमिक सत्र एवं समापन सत्र में लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों के साथ विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों ने शोध-पत्रों का वाचन किया।

दूसरे दिन के तृतीय अकादमिक सत्र का शुभारंभ प्रातः 10 बजे हुआ। सत्र की अध्यक्षता प्रो. डी. एस. नेगी, निदेशक, एमएमटीसी ने की तथा संचालन डॉ. अनूप सेमवाल ने किया। सत्र में उत्तराखंड के युवा लोक कलाकार श्री अरविंद चौहान एवं श्री अनुराग नौटियाल को उत्तराखंड की लोक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान के लिए प्रतीक चिह्न एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

लोक कलाकार श्री अरविंद चौहान ने अपने गीतों की प्रस्तुति के माध्यम से उत्तराखंड की प्राचीन एवं नवीन संगीत परंपराओं के समन्वय को लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने जीतू बगड़वाल जैसी प्रसिद्ध गढ़वाली लोकगाथा की गीतात्मक प्रस्तुति के माध्यम से पारंपरिक पर्वतीय वाद्ययंत्रों के साथ आधुनिक एवं पश्चिमी वाद्ययंत्रों के समावेश को डिजिटल युग के लोकगीतों की महत्वपूर्ण विशेषता के रूप में रेखांकित किया।

इसके बाद युवा लोकगायक श्री अनुराग नौटियाल ने पारंपरिक मांगल गीत की प्रस्तुति से अपने वक्तव्य का आरंभ किया। उन्होंने डिजिटल माध्यमों को लोक कलाओं और प्रतिभावान युवाओं के लिए नए अवसर उपलब्ध कराने वाला महत्वपूर्ण मंच बताया। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाओं को भी अपनी कला व्यापक स्तर पर प्रस्तुत करने का अवसर मिला है। साथ ही, प्रवासी उत्तराखंडियों को अपनी लोक संस्कृति और लोक परंपरा से जोड़े रखने में पर्वतीय लोकगीतों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

सत्र के मुख्य अतिथि डॉ. अजय कुमार सिंह ने अपने संबोधन में संगोष्ठी के विषय की गंभीरता और संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए नवाचार को संस्कृति का प्रमुख तत्व बताया। उन्होंने कहा कि लोक संस्कृति को रूढ़ियों में बांधने के बजाय उसमें प्रवाहशीलता और परिवर्तनशीलता बनाए रखना आवश्यक है। अतीत के संदर्भों में ही संस्कृति का मूल्यांकन करने की प्रवृत्ति उसके विस्तार में बाधक बन सकती है।

उन्होंने कहा कि डिजिटल युग ने उत्तराखंड की लोक संस्कृति को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक पटल पर स्थापित करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया है। इसके लिए योजनाबद्ध और निरंतर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने लोक संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने पर भी बल दिया। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने उत्तराखंड की लोक संस्कृति को समर्पित गीत प्रस्तुत कर वातावरण को भावपूर्ण बना दिया। इसके पश्चात विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों द्वारा विविध विषयों पर 15 शोध-पत्रों का वाचन किया गया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. डी. एस. नेगी ने सभी वक्ताओं एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए संगोष्ठी के सफल आयोजन के लिए आयोजन समिति की सराहना की। उन्होंने लोक संस्कृति के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे कार्यों और उपलब्ध अवसरों की चर्चा करते हुए कहा कि संगोष्ठी की प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए इस दिशा में निरंतर कार्य किए जाने की आवश्यकता है। सत्र के अंत में हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. मंजुला राणा ने सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापित किया।

भोजनावकाश के पश्चात संगोष्ठी का समापन सत्र आयोजित किया गया। सत्र की अध्यक्षता प्रो. ओ. पी. गुसाईं, अधिष्ठाता छात्र कल्याण ने की। प्रो. वाई. पी. रेवानी, कुलसचिव मुख्य अतिथि तथा प्रो. राजेंद्र सिंह नेगी, उप-निदेशक, चौरस परिसर विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

समापन सत्र में उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोक गायिका श्रीमती अंजली खरे एवं लोक गायक श्री सचिन पुसौला ने उत्तराखंड की लोक संस्कृति तथा डिजिटल युग से जुड़े विविध पक्षों को अपने गीतों और कलात्मक प्रस्तुतियों के माध्यम से अभिव्यक्त किया। उनकी प्रस्तुतियों ने सभागार में उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया और लोक संस्कृति की जीवंतता का प्रभावशाली अनुभव कराया। इस सत्र में भी विभिन्न विषयों पर 15 शोध-पत्रों का वाचन किया गया। संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में शोध-पत्र प्रस्तुत करने वाले विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शिक्षकों एवं शोधार्थियों को मुख्य अतिथियों द्वारा प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए।

समापन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो. वाई. पी. रेवानी ने कहा कि लोक संस्कृति किसी भी समाज की सामूहिक स्मृति और उसकी पहचान का आधार होती है। डिजिटल माध्यमों ने लोक संस्कृति को व्यापक समाज तक पहुंचाने के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में आयोजित इस प्रकार की संगोष्ठियां विद्यार्थियों और शोधार्थियों को अपनी लोक परंपराओं को समझने तथा उनके संरक्षण की दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। उन्होंने उत्तराखंड की लोक संस्कृति के दस्तावेजीकरण और डिजिटल अभिलेखीकरण पर भी बल दिया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. ओ. पी. गुसाईं ने कहा कि लोक संस्कृति केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में तकनीक का उपयोग लोक परंपराओं को समाप्त करने के बजाय उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए किया जाना चाहिए। विद्यार्थियों और युवाओं को अपनी जड़ों, भाषा, लोकगीत, लोकगाथाओं और परंपराओं से जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने संगोष्ठी के आयोजन के लिए हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग को बधाई देते हुए कहा कि इस प्रकार के अकादमिक विमर्श लोक संस्कृति के संरक्षण के साथ-साथ उसके नए आयामों की पहचान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रो. राजेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण है। डिजिटल तकनीक ने इसके संरक्षण, दस्तावेजीकरण और प्रसार की संभावनाओं को कई गुना बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि लोक कलाओं को उनके मूल संदर्भ और प्रामाणिकता के साथ डिजिटल माध्यमों पर प्रस्तुत किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकें।

सत्र का संचालन डॉ. अनूप सेमवाल ने किया। समापन अवसर पर हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. मंजुला राणा ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। इसके पश्चात संगोष्ठी के संयोजक डॉ. कपिल देव पंवार ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों, आयोजन समिति के सदस्यों, विश्वविद्यालय के अधिकारियों, शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि सभी के सहयोग एवं सहभागिता से संगोष्ठी अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रही। उन्होंने संगोष्ठी के विषय की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए लोक संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए भविष्य में भी इस प्रकार के अकादमिक प्रयास जारी रखने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके साथ ही उन्होंने दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के औपचारिक समापन की घोषणा की।

Leave a Reply