लखनऊ। यूपी में नकली और संदिग्ध दवाओं की सप्लाई चेन को खत्म करने के लिए लगातार कार्रवाई की जा रही है। इसी कड़ी में लखनऊ की अमीनाबाद मेडिसिन मार्केट से जुड़े एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जिसने हर किसी कोे चौंका दिया है। जांच में सामने आया कि यहां से प्रदेशभर में नकली और संभावित जानलेवा दवाओं की सप्लाई की जा रही थी। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) की छापेमारी में फर्जी और क्रॉस बिलिंग के जरिए दवाओं की खरीद-बिक्री का मामला सामने आया। आरोप है कि इस तरीके से अवैध कमाई की गई और जनस्वास्थ्य को गंभीर खतरे में डाला गया। इस मामले में पांच फर्मों और उनके संचालकों के खिलाफ अमीनाबाद थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई है। आखिर यह पूरा नेटवर्क कैसे काम करता था और इसका खुलासा कैसे हुआ।
FSDA की टीम ने 24 से 29 जुलाई के बीच लखनऊ और रायबरेली में छापेमारी कर नकली दवाओं के संगठित सिंडिकेट का खुलासा किया। जांच में सामने आया कि अमीनाबाद के मिश्रा एसोसिएट्स और रायबरेली के बछरावां स्थित मिश्रा मेडिकल एजेंसी के माध्यम से – Augmentin Duo-625 की 3200 स्ट्रिप्स की फर्जी बिलिंग के जरिए खरीद-बिक्री की गई। जांच में पाया गया कि जिस दवा की वास्तविक लैंडिंग कॉस्ट करीब ₹116.70 प्रति यूनिट थी – उसे ₹56.60 प्रति यूनिट के फर्जी बिलों पर खरीदा और बेचा गया। FSDA के मुताबिक दवा निर्माता कंपनी Glaxo से सत्यापन कराने पर पता चला कि संबंधित बैच उनकी अधिकृत सप्लाई चेन से जारी ही नहीं किया गया था। वहीं जिस फर्म के नाम से बिल बनाए गए, उसने भी ऐसे किसी लेन-देन से इनकार कर दिया। इससे फर्जी बिलिंग और नकली दवा कारोबार की पुष्टि हुई।
छापेमारी के दौरान मिश्रा एसोसिएट्स के सामने स्थित एक गोदाम में बड़ी मात्रा में दवाएं मिलीं, लेकिन वहां औषधि भंडारण का कोई वैध लाइसेंस नहीं था। सबसे गंभीर बात यह रही कि ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन जिसे 2 से 8 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखना अनिवार्य है। उसे बिना रेफ्रिजरेटर केवल थर्मोकोल बॉक्स में रखा गया था। FSDA ने जांच के लिए पांच दवाओं के नमूने ले लिए हैं और पूरे गोदाम को सील कर दिया है।
जांच में यह भी सामने आया कि भारत फार्मा और एमडीएच फार्मा जैसी फर्मों के नाम पर बड़े पैमाने पर बिलिंग की जा रही थी, लेकिन मौके पर दोनों फर्म लगभग बंद मिलीं। वहां न तो दवाओं का स्टॉक मिला और न ही खरीद-बिक्री से जुड़े रिकॉर्ड। दोनों फर्मों के प्रोपराइटरों ने लिखित बयान में बताया कि फर्मों का पूरा संचालन देवेन्द्र शुक्ला और राहुल नाम के लोग करते थे, जबकि उन्हें केवल नकद भुगतान दिया जाता था। विभाग का कहना है कि पूरे नेटवर्क की जांच जारी है और मामले में शामिल अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
